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उत्तराखंड

जानिए शीतल अष्टमी का महत्व और क्यों मनाया जाता है ये त्योहार

शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा या बासोड़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत देवी शीतला को समर्पित है। हर साल यह होली के आठवें दिन मनाया जाता है। भक्त इस अवसर पर देवी को बासी प्रसाद चढ़ाते हैं और एक दिन पहले तैयार किए गए भोजन का सेवन करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें इसकी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना व्रत पूरा नहीं होता है, तो चलिए यहां पढ़ते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार एक वृद्ध महिला और उसकी दो बहुओं ने देवी शीतला के लिए उपवास रखा था। दोनों बहुओं ने मान्यताओं के अनुसार, एक दिन पहले ही प्रसाद के लिए भोजन बनाकर तैयार कर लिया, लेकिन दोनों बहुओं के बच्चे छोटे थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि कहीं बासी खाना उनके बच्चों को नुकसान न कर दे।

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इसलिए उन्होंने बच्चों के लिए ताजा खाना दोबारा से तैयार किया, जब वे दोनों शीतला माता की पूजा के बाद घर वापस लौटीं, तो उन्होंने अपने बच्चों को मृत पाया। इस दृश्य को देखकर वे जोर-जोर से विलाप करने लगीं। तब उनकी सास ने उन्हें बताया कि ”यह शीतला माता के प्रकोप का प्रभाव है। ऐसे में जब तक ये बच्चे जीवित न हो जाएं, तब तक तुम दोनों घर वापस मत आना।”

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दोनों बहुएं अपने मृत बच्चों को लेकर इधर-उधर भटकने लगीं, तभी उन्हें एक पेड़ के नीचे दो बहनें बैठी मिलीं जिनका नाम ओरी और शीतला था। वे दोनों बहने गंदगी और जूं के कारण बहुत परेशान थीं।

उन्होंने उनकी सहायता की और उनके सिर की गंदगी साफ की, जिससे शीतला और ओरी ने प्रसन्न होकर दोनों को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। तब उन दोनों बहुओं ने अपनी सारी व्यथा उन दोनों बहनों को बताई। इस पर शीतल माता अपने स्वरूप में उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें बताया कि ”ये सब शीतला अष्टमी के दिन ताजा खाना बनाने के कारण हुआ है। तब दोनों बहुओं ने माता शीतला से क्षमा याचना की और आगे से ऐसा न करने को कहा।”

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देवी शीतला ने प्रसन्न होकर दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों बहुएं खुशी-खुशी घर लौट आईं और माता का गुणगान किया।

नोट:- यह अपडेट सिर्फ पौराणिक कथाओं के अनुरूप मात्र है।

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