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(जरूरी खबर) अब भाजपा पूरा करेगी तीसरा सबसे बड़ा वादा ! फैसले का क्या है संदेश, पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट:-

आम तौर पर चुनाव जीतने के बाद सरकार सबसे पहले घोषणा पत्र में किए गए वादों में से कोई एक बड़ा फैसला पूरा करती है। लेकिन उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने सबसे पहले उस वादे को पूरा करने की दिशा में कदम उठाया है। जो वादा, उसने चुनाव प्रचार के दौरान किया था। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने प्रचार के दिन कहा था कि अगर उनकी सरकार बनी थी तो वह राज्य में समान नागरिक संहिता को लागू करेंगे । औ इसके लिए एक कमेटी का गठन करेंगे, जिसमें कानून के विशेषज्ञ, वऔर बुद्धिजीवी शामिल होंगे। और इसी कड़ी में बीते बृहस्पतिवार को उत्तराखंड कैबिनेट ने कमेटी बनाने की मंजूरी दे दी है।

भाजपा का सबसे पुराने एजेंडे में से एक है यूनिफॉर्म सिविल कोड

भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने के पक्ष में रही है। जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद-370 खत्म करना, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और पूरे देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना, भाजपा के सबसे बड़े वादे रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए जारी घोषणा पत्र में भी भाजपा ने इन 3 वादों को पूरा करने की बात कही थी। इन तीन वादों में अनुच्छेद-370 खत्म करना और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के वादे पूरे हो चुके हैं। ऐसे में यह संभावना जताई जाती रही है कि भाजपा 2024 के चुनावों से पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड की दिशा में कोई बड़ा कदम उठा सकती है।

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उत्तराखंड सरकार के फैसला का क्या है संदेश

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ शशिकांत पांडे  टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से कहते हैं ‘देखिए यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना भाजपा का शुरू से एजेंडा रहा है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार का इस दिशा में आगे बढ़ना निश्चित तौर पर पार्टी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

यह ऐसा नीतिगत मामला है जिस पर केवल धामी अपने स्तर पर फैसला नहीं कर सकते हैं। निश्चित तौर पर पार्टी की तरफ से सोच-समझकर उठाया गया यह कदम है। भाजपा को अनुच्छेद 370 और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दे उठाने का फायदा मिला है। ऐसे में वह अब यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू कर उसे राजनीतिक रूप से भुनाना चाहेगी। 

जहां तक उत्तराखंड में पहले लागू करने की बात है। तो राज्य की जनसांख्यिकी भाजपा के मुरीद है। ऐसे में वहां पर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना आसान है। उन्हें उत्तर प्रदेश या दूसरे बड़े राज्यों जैसे प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा।

उत्तराखंड की करीब 1.10 करोड़ आबादी है। इसमें 83 फीसदी हिंदू आबादी है। जबकि करीब 14 फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। यानी करीब 15-16 लाख मुस्लिम आबादी है। 

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ट्रायल के लिए छोटे राज्य ?

शशिकांत कहते है कि निश्चित तौर पर उत्तराखंड में इसे लागू कर पार्टी जरूर यह आंकने का प्रयास करेगी कि इस संवेदनशील मुद्दे का जमीनी असर क्या होता है। उसके लिए बड़े राज्यों में पहले लागू करने से अच्छा है कि वह छोटे राज्यों के जरिए जनता की नब्ज टटोले। इस फैसले से पार्टी यह भी साबित करने की कोशिश करेगी कि वह जो वादा करती है उसे पूरा करती है। और उसके पास 2024 के लिए एक मुद्दा भी तैयार हो सकता है। जिसके जरिए वह मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करेगी। हालांकि इसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी लेना जरूरी है।

गोवा में पहले से है लागू

फिलहाल देश में गोवा एक ऐसा राज्य है, जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है। यह कानून पुर्तगालियों ने 1867 में गोवा में लागू किया था। जिसे पुर्तगाली सिविल कोड कहा जाता था। बाद में जब  भारत ने 1961 में गोवा को पुर्तगालियों के कब्जे से आजाद कराया गया,  इसके बाद साल1962 में भारतीय संसद ने गोवा सिविल कोड जारी रखने की मंजूरी दी। साथ राज्य की विधायिका को यह अधिकार दिया कि वह चाहे तो इसे हटा सकती है या जरूरत होने पर इसमें संशोधन कर सकती है। उस वक्त से गोवा में यह यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है। 

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लेकिन यह बात समझना भी जरूरी है कि आजादी के बाद से अभी तक किसी राज्य ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं किया है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति-निर्देशक तत्वों के तहत यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रावधान किया गया है। जिसे कहा गया है कि राज्य यानी भारत सरकार ‘भारत के पूरे भू-भाग में अपने नागरिकों के लिए एक यूनिफॉर्म सिविल कोड सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।’ भाजपा इसी नीति निर्देशक तत्व के आधार पर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने की बात कहती है।

असल में भारत में क्रिमिनल कानून सभी नागरिकों के लिए समान है । लेकिन परिवार और संपत्ति के बंटवारे के लिए नियम धर्मों के आधा पर अलग-अलग हैं। यदि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाता है तो यह कानून सभी जाति, धर्म, समुदाय या संप्रदाय के पर्सनल लॉ से ऊपर होंगा।  यानी देश में विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एकरूपता आ जाएगी। फिलहाल भारत में  हिंदू विवाह अधिनियम-1955 के प्रावधान, शरीयत अधिनियम-1937, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम- 1925, मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम-1939, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम- 1956 आदि सिविल कानून है।

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