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अपने ही देश के किन राज्यों में अल्पसंख्यक घोषित किए जा सकते हैं हिंदू? देखें पूरी डिटेल…….

नई दिल्ली, 28 मार्च: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने एक हलफनामा देकर साफ कर दिया है कि देश के करीब 10 राज्य ऐसे हैं, जहां पर राज्य सरकारें हिंदुओं को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे सकती हैं। हालांकि, इसके साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि वह पूरे देश के लिए कोई एक फॉर्मूला ना निकाले और यह जिम्मेदारी राज्यों को ही दिया जाना चाहिए,

क्योंकि प्रत्येक राज्य में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान का आधार अलग होगा। केंद्र सरकार की ओर से यह हलफनामा एक भाजपा नेता की याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसमें याचिकाकर्ता की याचिका भी खारिज करने की अपील की गई है।

राज्य सरकारें घोषित कर सकती हैं अल्पसंख्यक समुदाय-केंद्र।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राज्यों को अपने क्षेत्राधिकार में धार्मिक और भाषाई आधार पर समूहों को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार है, यदि वे समूह राज्य की जनसंख्या में कम हों। लेकिन, साथ ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध दिया है कि वह खुद ऐसा ना करे। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में जो एफिडेविट दाखिल किया गया है, उसके मुताबिक, ‘राज्य सरकारें भी धार्मिक और भाषाई समुदायों को अपने राज्यों में अल्पसंख्यक समुदाय घोषित कर सकती हैं।

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किन राज्यों ने दिया है अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा ?

2016 में महाराष्ट्र में यहूदियों को अल्पसंख्य समुदाय का दर्जा दिया गया। जबकि कर्नाटक उर्दू, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लामानी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती को भाषाई अल्पसंख्यकों का दर्जा दे चुका है। केंद्र सरकार की ओर से सर्वोच्च अदालत में ये जवाब बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर दायर किया गया है। उन्होंने 2011 की जनगणना के आधार पर अदालत से गुजारिश की थी कि कई राज्यों में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होते हुए भी उन्हें उसका लाभ नहीं मिलता और जो समुदाय वहां बहुसंख्यक हैं, वो बावजूद इसके अल्पसंख्यकों वाला फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने अपनी याचिका में इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ही एक फैसले (टीएमए पाई केस) का हवाला दिया था।

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क्या है टीएमए पाई केस ?

2002 में टीएमए पाई फाउंडेशन केस में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्टिकल-30 का मकसद, जो कि अल्पसंख्यकों को धार्मिक और भाषाई आधार पर शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करने और उसके संचालन का अधिकार देता है उसे राज्यवार ध्यान में रखा जाए। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने कई राज्यों में हिंदुओं, बहाई और यहूदियों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की गुहार लगाई थी।

केंद्र की लिस्ट में धार्मिक अल्पसंख्यक कौन हैं ?

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून, 1992 के सेक्शन 2(सी) के तहत केंद्र ने 1993 में कुल पांच समुदायों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दे रखा है- मुस्लिम, सिख, बौद्ध, पारसी और क्रिश्चियन। अश्विनी उपाध्यायमें ने इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से केंद्र को राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए एक गाइडलाइंस तय करने की मांग की थी, जिसके तहत 10 राज्यों में अल्पसंख्यक होते हुए भी हिंदुओं को अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं और लाभ से वंचित रहना पड़ता है।

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हिंदुओं को अल्पसंख्यकों का दर्जा मिलने से क्या होगा ?

केंद्र सरकार की एफिडेविट के मुताबिक जिस राज्य में हिंदुओं को अल्पसंख्यकों का दर्जा मिलेगा वहां पर वे अपनी पसंद के शिक्षा संस्थान स्थापित कर सकते हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए संबंधित राज्य ही गाइडलाइंस तय कर सकते हैं। लेकिन, इसके साथ ही केंद्र सरकार ने अश्विनी उपाध्याय की याचिका यह कहकर खारिज किए जाने की अपील की है कि ‘याचिकाकर्ता ने जिस तरह की राहत मांगी है, वह ना तो व्यापक रूप से जनहित या राष्ट्र हित में है।’ केंद्र ने यह भी कहा है कि पूरे देश में धार्मिक और भाषाई पहचान के लिए एक आधार नहीं हो सकता है, क्योंकि ‘भारत एक ऐसा देश है, जिसकी बहुत ही खास विशेषताएं हैं। एक धार्मिक समूह जो कि एक राज्य में बहुसंख्यक हों, हो सकता है कि दूसरे राज्य में वह अल्पसंख्यक हों।

स्रोत इंटरनेट मीडिया

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