उत्तराखंड
उत्तराखंड में बढ़ते पर्यटन दबाव पर उठे सवाल, कैरिंग कैपेसिटी तय करने की मांग तेज
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही पर्यटकों की संख्या अब पर्यटन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और कानून व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर भीड़, यातायात अव्यवस्था, पर्यावरणीय दबाव और अनुशासनहीन गतिविधियों को लेकर स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरणविदों ने चिंता जताते हुए सरकार से वैज्ञानिक पर्यटन नीति लागू करने की मांग की है।
मसूरी, नैनीताल, भीमताल, ऋषिकेश, औली, मुक्तेश्वर, चकराता, कौसानी सहित बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों पर इन दिनों भारी संख्या में पर्यटक पहुंच रहे हैं। सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान हजारों वाहनों के कारण कई स्थानों पर घंटों तक जाम की स्थिति बनी रहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका असर दैनिक जीवन पर पड़ रहा है और अस्पतालों, विद्यालयों तथा आवश्यक सेवाओं तक पहुंचना भी कठिन हो जाता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कुछ पर्यटक सार्वजनिक स्थानों पर शराब सेवन, तेज ध्वनि में संगीत, देर रात तक डीजे, सड़कों पर स्टंट और कूड़ा फैलाने जैसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, जिससे देवभूमि की सांस्कृतिक गरिमा और शांत वातावरण प्रभावित हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कुछ रिसॉर्ट और पर्यटन प्रतिष्ठानों में देर रात तक होने वाली पार्टियों को लेकर भी लोगों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा तथा सामाजिक वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अनियंत्रित पर्यटन का दबाव वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर भी पड़ रहा है। हाथियों के कॉरिडोर, गुलदारों के आवास और संवेदनशील वन क्षेत्रों के आसपास बढ़ती निर्माण गतिविधियां भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को बढ़ा सकती हैं।
जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक धारे और नौले सूखने की स्थिति में हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर प्राकृतिक जलस्रोतों का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, जबकि आसपास के गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं।
होम स्टे नीति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। कई क्षेत्रों में लोगों का कहना है कि होम स्टे की आड़ में बड़े स्तर पर व्यावसायिक होटल और गेस्ट हाउस संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने नीति की समीक्षा कर स्पष्ट मानक निर्धारित करने की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के प्रत्येक पर्यटन स्थल की एक सीमित कैरिंग कैपेसिटी (वहन क्षमता) है। यदि पर्यटकों और वाहनों की संख्या का वैज्ञानिक आधार पर प्रबंधन नहीं किया गया तो भविष्य में पर्यावरणीय, सामाजिक और आधारभूत संरचना संबंधी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने सरकार से प्रमुख पर्यटन स्थलों की कैरिंग कैपेसिटी तय करने, पर्यटकों और वाहनों के प्रवेश का वैज्ञानिक प्रबंधन लागू करने, होम स्टे नीति की समीक्षा करने, प्राकृतिक जलस्रोतों के व्यावसायिक उपयोग पर निगरानी बढ़ाने तथा सार्वजनिक स्थानों पर कानून व्यवस्था भंग करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उत्तराखंड सदैव पर्यटकों का स्वागत करता रहा है, लेकिन पर्यटन का विकास प्रकृति, संस्कृति, आस्था और कानून के सम्मान के साथ होना चाहिए। उनका मानना है कि संतुलित और वैज्ञानिक पर्यटन नीति ही देवभूमि की मूल पहचान और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए पर्यटन को टिकाऊ बना सकती है।